मध्यप्रदेश की प्रमुख कृषि उपजों / निम्न कृषि उपजों के महत्व क्षेत्र वितरण एवं व्यापार के सन्दर्भ में संक्षेप चावल, गेहूँ, कपास, गन्ना, दालें, तिलहन ।
मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान है। इससे न केवल अनेक व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त होता है, वरन् विभिन्न प्रकार की उपजें भी प्राप्त होती हैं। मध्यप्रदेश में विभिन्न प्रकार की जलवायु एवं मिट्टियाँ पायी जाती हैं। अतः यहाँ अनेक प्रकार की फसलें बोना सम्भव है। मध्यप्रदेश में कृषि फसलों को निम्न दो भागों में बाँटा जा सकता है-
1. रबी की फसलें रबी की फसलों में मुख्यतया गेहूँ, चना, सरसों, आलू तथा मटर आदि की खेती इस राज्य में की जाती है।
2. खरीफ की फसलें इस राज्य में खरीफ की फसलों में मुख्यतया चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का, कपास तथा तिलहन आदि की खेती की जाती है।
मध्यप्रदेश की प्रमुख उपज
चावल (Rice)
मध्यप्रदेश में चावल सबसे महत्वपूर्ण फसल है। यह अनेक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है-
महत्व-1. ऐतिहासिक महत्व-मध्यप्रदेश में चावल की खेती अनेक वर्ष पूर्व से हो रही है।
2. धार्मिक महत्व-मध्यप्रदेश में चावल का प्रयोग प्रत्येक धार्मिक कार्य में अनिवार्य रूप से किया जाता है जो चावल के व्यापक प्रयोग तथा महत्व को दर्शाता है।
3. प्रमुख खाद्य-पदार्थ-चावल अधिकांश मध्यप्रदेश के लोगों का प्रमुख भोजन है। चावल का प्रयोग खुशी के अवसरों तथा त्यौहारों पर किया जाता है।
4. औद्योगिक महत्व-चावल को साफ करने के लिये राज्य में अनेक कारखाने कार्य कर रहे हैं। चावल से पापड़ आदि स्वादिष्ट वस्तुयें बनाने तथा तेल निकालने का कार्य कुटीर- उद्योगों के रूप में किया जाता है।
5. रोजगार की प्राप्ति-चावल की खेती करने तथा चावल को साफ करने के कार्यों आदि में अनेक व्यक्तियों को रोजगार की प्राप्ति होती है।
6. चावल के पौधे का प्रयोग-चावल के पौधे का तिनका काफी सख्त होता है। इसलिये इसका प्रयोग छप्पर, कार्ड-बोर्ड, चटाई, कागज, झाडू आदि बस्तुयें बनाने में किया जाता है। चावल के भूसे को सीमेन्ट में मिलाकर ध्वनि रोधक (Sound Proof) दीवारें बनाई जाती हैं।
चावल की फसलें - म.प्र. में चावल की प्रायः तीन फसलें होती हैं-
1. अमन-अमन शीतकालीन प्रमुख फसल है जिससे 70% प्रतिशत से भी अधिक
उत्पादन होता है।
2. ओस-यह पतझड़ कालीन फसल है। इस फसल से 30% से 35% प्रतिशत तक उत्पादन होता है।
3. बोरो-यह ग्रीष्मकालीन फसल है। इससे बहुत कम उत्पादन होता है।
चावल उत्पादक क्षेत्र-चावल के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र म.प्र. में बालाघाट, मण्डला, सीधी, छिंदवाड़ा, बैतूल, रीवा, सतना हैं। म.प्र. की कुल भूमि के 22.5 प्रतिशथ भाग में चावल की कृषि की जाती है।
चावल का व्यापार-चावल का उत्पादन 88% भाग उत्पादन क्षेत्रों में ही खप जाता है तथा शेष 12% भाग ही मण्डियों में क्रय-विक्रय हेतु पहुँच पाता है। यहाँ पर धीरे-धीरे चावल उत्पादन की जापानी पद्धति भी अपनाई जा रही है।
गेहूँ (Wheat)
महत्त्व-कृषि क्षेत्र तथा उत्पादन की दृष्टि से चावल के पश्चात् गेहूँ मध्यप्रदेश की दूसरी महत्त्वपूर्ण फसल है।
1. ऐतिहासिक महत्व-म.प्र. में गेहूँ पैदा करने की कला काफी समय से प्रचलित है।
2. खाद्यान्न के रूप में प्रयोग-म.प्र. में अधिकांश व्यक्ति शाकाहारी हैं।
अतः चावल के पश्चात् गेहूँ से बनी मैदा, सूजी, डबलरोटी तथा बिस्कुट आदि का प्रयोग प्रत्येक म.प्र. वासी द्वारा किया जाता है।
3. सन्तुलित आहार-गेहूँ मनुष्य के लिए अत्यन्त उपयोगी है क्योंकि इसमें विटामिन, प्रोटीन तथा कार्बोहाइड्रेट्स काफी मात्रा में मिलते हैं जिससे भोजन संतुलित हो जाता है।
4. औद्योगिक महत्व-गेहूँ पर मैदा, सूजी, डबलरोटी तथा बिस्कुट उद्योग आधारित हैं। वस्त्रों में मांड देने के लिए गेहूँ का प्रयोग किया जाता है।
5. पशुओं के लिए चारा-गेहूँ के तने तथा भूसे का प्रयोग पशुओं के चारे के रूप में किया जाता है जो पशुओं के लिए अत्यन्त पौष्टिक आहार है।
6. रोजगार की प्राप्ति-म.प्र. में गेहूँ की खेती विशाल स्तर पर की जाती है। अतः अनेक व्यक्तियों को इससे रोजगार की प्राप्ति होती है
उत्पादक क्षेत्र-गेहूँ उत्पादन की दृष्टि से म.प्र. का पाँचवा स्थान है। भारत के कुल उत्पादन का 10% उत्पादन इसी राज्य से प्राप्त होता है। राज्य के ग्वालियर, सागर, होशंगाबाद, उज्जैन तथा रीवा आदि जिले प्रमुख गेहूँ उत्पादक क्षेत्र हैं।
व्यापार-म.प्र. में कुल गेहूँ उत्पादन का लगभग 45% भाग उत्पादन केन्द्रों पर ही बिक जाता है जबकि शेष 55% भाग मण्डियों में क्रय-विक्रय हेतु पहुँच जाता है।
कपास (Cotton)
महत्व-म.प्र. की अर्थव्यवस्था में रेशे वाली फसलों में कपास एक प्रमुख फसल है। इसके महत्व के प्रमुख बिन्दु निम्न हैं-
(i) ऐतिहासिक महत्व-म.प्र. में कपास उत्पन्न करने की कला अत्यन्त प्राचीन है।
(ii) औद्योगिक महत्व-सूती वस्त्र उद्योग को कच्चे माल की प्राप्ति कपास के रूप में ही होती है।
(iii) अन्य उपयोग-कपास बनाने के अतिरिक्त कपास का प्रयोग रूई के रूप में अस्पतालों में किया जाता है। कपास के बीज बिनौला का प्रयोग पशुओं के भोजन के रूप में किया जाता है। इसके डोडियों से तेल भी निकाला जाता है। कपास के पौधे के तनों का प्रयोग छप्पर बनाने तथा ईंधन के रूप में काम में लिया जाता है।
(iv) रोजगार की प्राप्ति-कपास की खेती में व इस पर आधारित सूती वस्त्र एवं अन्य उद्योगों में भी अनेक व्यक्ति कार्यरत हैं।
(v) सरकार को लाभ-कपास सरकारी आय का प्रमुख स्त्रोत है। कपास द्वारा निर्मित वस्त्रों पर सरकार करों के रूप में तथा कपास एवं वस्त्रों का निर्यात करके विदेशी मुद्रा प्राप्त करती है।
कपास की किस्में
(i) छोटे रेशे वाली कपास-इस कपास का रेशा 11/16 इंच अथवा इससे छोटा होता है।
(ii) मध्यम रेशे वाली कपास का रेशा 7/8 इंच से 11/16 इंच तक होता है।
(iii) लम्बी रेशे वाली कपास-इसका रेशा 7/8 इंच या इससे अधिक लम्बा होता है। में दा कपास उत्पादक क्षेत्र मध्यप्रदेश में कपास की श्रेष्ठ किस्में पैदा होती हैं। यहाँ कपास की उम्दा एवं मामूली किस्में पैदा की जाती है। इस राज्य के इन्दौर, धार, देवास, उज्जैन, रतलाम, मन्दसौर, नीमच आदि जिलों में कपास की खेती की जाती है। म.प्र. का कपास उत्पादन में द्वितीय स्थान है। व्यापार-कपास का समस्त व्यापार राजकीय कपास निगम द्वारा किया जाता है।
कपास उत्पादक क्षेत्र
मध्यप्रदेश में कपास की श्रेष्ठ किस्में पैदा होती हैं। यहाँ कपास की उम्दा एवं मामूली किस्में पैदा की जाती है। इस राज्य के इन्दौर, धार, देवास, उज्जैन, रतलाम, मन्दसौर, नीमच आदि जिलों में कपास की खेती की जाती है। म.प्र. का कपास उत्पादन में द्वितीय स्थान है। व्यापार-कपास का समस्त व्यापार राजकीय कपास निगम द्वारा किया जाता है।
गन्ना (Sugarcane)
महत्व-गन्ना आधुनिक युग की अत्यन्त महत्वपूर्ण व्यापारिक फसल है। इसका प्रयोग अनेक क्षेत्रों में किया जाता है-
1. ऐतिहासिक महत्व - अथर्वेद तथा आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में गन्ने का उल्लेख मिलता है उसकी स्पष्ट करता है. जो उसकी प्राचीनता को स्पष्ट करना है,
2 .गन्ने का उपयोग खांडसारी तथा चीनी बनाई जाती है। गन्नो के पैरने से जो शीरा बचता है, उससे शराब एवं स्प्रिट बनाई जाती है। गन्ने को चूसने तथा रस निकाल कर पीने के काम में भी लाया जाता है।
3. छिलके का प्रयोग गन्ने का छिलका पशुओं को खिलाने तथा जलाने के काम में आता है। इनका प्रयोग कागज, खिलौना बनाने आदि में भी किया जाता है।
4. औद्योगिक महत्व-इस पर गुड़, चीनी, शराब, स्प्रिट आदि उद्योग आधारित हैं। इन सभी उद्योगों को कच्चे माल की पूर्ति गन्ने के रूप में ही होती है।
5. रोजगार की प्राप्ति-गन्ने की खेती में अनेक व्यक्ति कार्यरत हैं तथा इस पर आधारित उद्योगों में भी अनेक व्यक्तियों को अप्रत्यक्ष रूप में रोजगार प्राप्त है।
6. विदेशी विनिमय की प्राप्ति-गन्ने से निर्मित चीनी का निर्यात करके करोड़ों रु. की विदेशी मुद्रा प्राप्त की जाती है।
गन्ना उत्पादक क्षेत्र-मध्यप्रदेश में उज्जैन, सीहोर, जावरा, मन्दरवारा, हरसदिमा तथा शाजापुर गन्ना उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र हैं।
दालें (Pulse)
महत्व-म.प्र. में उत्पन्न होने वाली कृषि उपजों में दालों को भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। म.प्र. में कई किस्म की दालें उत्पन्न की जाती हैं। इनमें अरहर, तुवर, चना प्रमुख हैं।
भौगोलिक दशायें-दाल की फसल के लिये उच्च तापमान तथा अधिक वर्षा की आवश्यकता होती है। चिकनी तथा दोमट मिट्टी, दाल की उपज के लिये उपयुक्त होती है। वर्षा 100 सेमी. से 200 सेमी. तक उपयुक्त होती है। दाल की फसल वर्षा के प्रारम्भ में बोई जाती है तथा अक्टूबर तथा नवम्बर माह में काट ली जाती है।
म.प्र. में 1960-61 में 3748 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में सभी प्रकार की दालें बोयी गई थीं तथा सन् 1966-67 में 3735 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में बोयी गयी थी।
उत्पादक क्षेत्र-म.प्र. राज्य में दालों का उत्पादन बैतूल, भिण्ड, मुरैना, ग्वालियर, घार, इन्दौर, झाबुआ, रीवा, सतना, सीधी, होशंगाबाद में विशेषकर होता है। म.प्र. में दाल का उत्पादन 1960-61 से 1984-85 तक 22 से 37 लाख टन तक रहा। सन् 1995-96 में दाल का उत्पादन लक्ष्य 85 लाख टन था।
तिलहन
महत्व-मध्यप्रदेश में तिल एवं अलसी मुख्य तिलहन हैं लेकिन मूंगफली का उत्पादन भी होता है, यह तेल और भोज्य पदार्थ दोनों के लिये उगायी जाती है।
भौगोलिक दशायें-तिल एवं अलसी रबी की फसल है और मूँगफली खरीफ की। तिल के लिये हल्की मिट्टी एवं कम वर्षा चाहिये जबकि अलसी सभी प्रकार की मिट्टी जहाँ पर नमी हो पैदा की जाती है। मूँगफली के लिये काली गहरी मिट्टी एवं उच्च तापमान की आवश्यकता रहती है।
उत्पादन क्षेत्र-तिल के उत्पादन क्षेत्र उत्तरी एवं पश्चिमी मध्यप्रदेश हैं अलसी मध्यप्रदेश के प्रत्येक हिस्से में बोयी जाती है। मूँगफली मुख्यतः मालवा पठार तथा नर्मदा की निचली घाटी एवं निकटवर्ती दक्षिणी भाग में होती है।
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