मध्यप्रदेश के राज्य के अपवाह तन्त्र का वर्णन / मध्यप्रदेश में पाये जाने वाले प्रमुख अपवाह प्रकार मध्यप्रदेश के अपवाह तन्त्र की विवेचना  /मध्य प्रदेश के अपवाह तन्त्र  (म.प्र. का ड्रेनेज सिस्टम)

                           

मध्य प्रदेश राज्य में मुख्यतः निम्न चार अपवाह तन्त्र पाये जाते हैं-


(1) गंगा-यमुना नदी अपवाह तन्त्र, (2) महानदी अपवाह तन्त्र, (3) गोदावरी अपवाह तन्त्र, (4)नाटक अपवाह तन्त्र।


1. गंगा-यमुना नदी अपवाह तन्त्र-मध्यप्रदेश में गंगा-यमुना नदी अपवाह तन्त्र की उपस्थिति मध्यप्रदेश के उत्तरी भाग में मिलती है। मध्यप्रदेश के इस अपवाह तन्त्र में चम्बल, सिन्ध, बेतवा, केन, टोंस तथा सोन नदी सर्वप्रमुख नदियाँ हैं जो उत्तर एवं उत्तर पूर्व की ओर बहती हुई यमुना नदी में मिल जाती है।


चम्बल नदी-यह नदी मध्य प्रदेश में मऊ के निकट जनापात्र पहाड़ी से 616 मीटर ऊँचाई से निकलकर उत्तर-पूर्व की ओर बहकर राजस्थान के बूँदी, कोटा और धौलपुर जिलों में बहती हुई इटावा से 35 किलोमीटर दर यमुना में मिल जाती है। कालीसिन्ध, पार्वती और बनास इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं।


बेतवा नदी-यह नदी मध्य प्रदेश में भोपाल के निकट से निकल कर उत्तर-पूर्वी दिशा  में बहती हुई भोपाल, ग्वालियर जिलों को सींचती है और उसके पश्चात् हमीरपुर के निकट यमुना में मिल जाती है।


कालीसिन्ध-इन्दौर के पूर्व में बागली के निकट विन्ध्याचल पर्वत के उत्तरी ढाल से निकलकर यह नदी उत्तर की ओर बहती हुई चम्बल में मिल जाती है।


परवन-यह भी कालीसिन्ध की सहायक नदी है।


पार्वती-मालवा के पठार से निकल कर यह नदी उत्तर की ओर बहती हुई चम्बल में मिल जाती है।


सोन नदी-यह नदी अमरकंटक की पहाड़ियों में नर्मदा के उद्‌गम स्थान के निकट से निकलती है। शीघ्र ही इस पठार को पार कर नीचे उतरना पड़ता है, अतः इस पर अनेक झरने पाये जाते हैं। यह नदी गंगा में जाकर मिल जाती है। टौंस नदी-यह नदी कैमूर की पहाड़ियों में स्थित तमसाकुण्ड नामक जलाशय से


निकलकर उत्तर-पूर्व दिशा में बहती हुई सतना नदी में मिल जाती है। रिहन्द नदी-उत्तर-पूर्वी मध्य प्रदेश में पूर्वी पठार से निकल कर हिन्द नदी सोन नदी में मिल जाती हैं।


इस प्रकार यह सभी नदियाँ यमुना-गंगा अप्रवाह तन्त्र का अंग है क्योंकि अन्ततः इन सभी नदियों का जल गंगा अथवा यमुना के माध्यम से बंगाल की खाड़ी में ही पहुँचता है। 

                                        


2. महानदी अपवाह तन्त्र-नर्मदा नदी नर्मदा अपवाह तन्त्र की एकमात्र महत्वपूर्ण नदी है। इस नदी का उद्‌गम मैकाल श्रेणी के अमरकंटक शिखर से होता है। नर्मदा नदी वस्तुतः एक भ्रंशन घाटी में पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है। यह भ्रंशन घाटी क्रिटेसियस काल में भूगर्भिक हलचलों के फलस्वरूप निर्मित हुई थी। इस नदी की कुल लम्बाई 1310 किमी. है जिसमें से 1078 किमी. की लम्बाई मध्य प्रदेश में तथा 31 किमी. की लम्बाई मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र की सीमाओं पर है। अमरकंटक से निकलने के बाद यह नदी एक संकरी तथा गहरी घाटी बहती है जिसके उत्तर में विन्ध्याचल तथा दक्षिण में सतपुड़ा श्रेणियाँ स्थित हैं। नर्मदा नदी अपने प्रवाह मार्ग में कई जल प्रपातों को जन्म देती हैं जिसमें कपिलधारा प्रपात, दूधधारा प्रपात, धुआंधार प्रपात, सहस्त्र धारा प्रपात तथा महेश्वर प्रपात उल्लेखनीय हैं। जबलपुर नगर से लगभग 20 किमी. की दूरी पर संगमरमर की चट्टानों पर भेड़ाघाट का धुआंधार जलप्रपात (15 मीटर ऊँचाई) स्थित है।


नर्मदा नदी की समस्त सहायक नदियाँ छोटी-छोटी हैं। यह नदी मध्य प्रदेश की पश्चिमी सीमा पर अखरानी पहाड़ियों को काटती हुई गुजरात के मैदानी भाग में प्रवेश करती है। तथा नर्मदा नदी की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है, जो पंचमढ़ी के महादेव पर्वत से निकलती है। तवा नदी सतपुड़ा के अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों का जल संग्रह कर नर्मदा में डालती है, जिससे नर्मदा नदी में बाढ़ की समस्या उत्पन्न हो जाती है।


3. महानदी अपवाह तन्त्र-महानदी के अपवाह तन्त्र का मध्य प्रदेश के पूर्वी भाग में विस्तार मिलता है। मध्य प्रदेश के पूर्वी अंचल में महानदी एवं उसकी सहायक नदियाँ बस्तर के पठार तथा सतपुड़ा श्रेणियों से निकलकर एक मैदानी भाग का निर्माण करती है जिसे छत्तीसगढ़ के मैदान या महानदी बेसिन के नाम से जाना जाता है। महानदी एवं इसकी सहायक नदियों का प्रवाह सामान्यतया पश्चिम से पूर्व की ओर है तथा यह नदियाँ अपने अपवाह क्षेत्र में पादपाकार अपवाह प्रतिरूप निर्मित करती है।

मुख्य महानदी का उद्गम रायपुर उच्च भूमि में सिंहवा पहाड़ियों से होता है, जहाँ से यह नदी उत्तर-पश्चिम तथा उत्तर-पूर्व की ओर क्रमशः बस्तर तथा रायपुर जिलों में प्रवाहित होती है। सिवरीनारायण नामक स्थान के निकट महानदी अपनी प्रमुख सहायक नदी शिवनाथ से मिल जाती है। शिवनाथ नदी राजनांदगाँव उच्च भूमि से निकलती है। शिवनाथ नदी बिलासपुर, राजनांदगाँव तथा दुर्ग जिलों में अपनी सहायक नदियों लीलागर, मनियारी, अरपा, अमनेर तथा खारून के साथ प्रवाहित होती है।


शिवनाथ नदी के संगम के बाद महानदी में उत्तर-पश्चिम की ओर से आकर मिलने वाली नदियों में हसदो तथा माँड महत्वपूर्ण हैं, जबकि दक्षिण की ओर से पैरी जोंक तथा तेल नदी आकर महानदी में मिलती हैं।


4. गोदावरी नदी तन्त्र-मध्य प्रदेश में गोदावरी नदी का क्रम अस्तित्व बस्तर के पठार पर मिलता है, जारों गोदावरी की सहायक नदी इन्द्रावती पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है। नारंगी, गुड़रा, निबरा, कोटरी, बोरडिंग उत्तर की ओर से इन्द्रावती में मिलने वाली महत्वपूर्ण सहायक नदियाँ हैं। दन्तेवाड़ा, बेरूदी तथा चिन्तावागू इन्द्रावती से दक्षिण की ओर से मिलने वाली सहायक नदियाँ हैं। बस्तर के पठार के दक्षिणी-पूर्वी भाग में मध्य प्रदेश तथा उड़ीसा राज्यों की सीमा के साथ-साथ गोदावरी की एक सहायक नदी सबरी बहती है। सबरी की प्रमुख सहायक नदियाँ कांगेर तथा मालेंगर हैं। कांगेर नदी पर तार्थगढ़ जल प्रपात 50 मीटर ऊँचा है, जबकि जगदलपुर से 40 किमी. पश्चिम की ओर इन्द्रावती नदी पर निर्मित चित्रकूट जल प्रपात 30 मीटर ऊँचा है।


नर्मदा नदी घाटी के दक्षिण में गोदावरी की प्रमुख सहायक नदियाँ लेनगंगा तथा पेच उत्तर से दक्षिण की ओर सतपुड़ा श्रेणियों में प्रवाहित होती हैं। वेनगंगा नदी सतपुड़ा श्रेणी के परसवाड़ा पठार से निकलती है तथा सिवनी-बालाघाट क्षेत्र में प्रवाहित होती है।


5. ताप्ती नदी अपवाह तन्त्र- मध्य प्रदेश राज्य में ताप्ती नदी का अपवाह तन्त्र क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटा है। सतपुड़ा श्रेणियों के मध्य में स्थित बैतूल पठार से ताप्ती नदी का उद्गम होता है। मध्य प्रदेश में इस नदी का अपवाह क्षेत्र बैतूल जिले के दक्षिणी- पूर्वी भाग में स्थित भैंसदेही क्षेत्र तथा खण्डवा जिले का बुरहानपुर क्षेत्र है। बुरहानपुर तहसील के मध्य में प्रवाहित होती हुई ताप्ती महाराष्ट्र राज्य में प्रवेश करती है।



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